सावन के महीने में होने वाली इस कावड़ यात्रा की क्या है मान्यता कैसे हुई इस यात्रा की शिरुआत ?

धर्म चक्र में आपका स्वागत है जैसा कि आप जानते हैं कि सावन का पवित्र महिना चल रहा है और इस समय जगह जगह लोग कावड़ यात्रा करते हैं. आपको भी घर से निकलते या रास्ते में बहुत सारे कावड़ लेजाते हुए दिख रहे होंगे. ये तो सभी जानते हैं कि सावन के इस महीने में कावड़ यात्रा होती है लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये कैसे और कहा शुरू हुई. किसने इसकी शुरुआत की. आज हम आपको कावड़ के इतिहास के बारे में बताने जा रहे हैं.

सावन के महीने में की जाती है कावड़ यात्रा (image source : satyagrah)

क्या होती है कावड़?

दरअसल, कावड़ का मूल शब्द “कावर” है, जिसका सीधा अर्थ कंधे से होता है. कावड़ यात्रा में सभी शिव भक्त अपने कंधे पर पवित्र जल का कलश लेकर पैदल यात्रा करते हुए ईष्ट शिवलिंगों तक पहुंचते हैं. कावड़ यात्रा के समय सभी भोलेनाथ के भक्तों में एक अलग आस्था, बहुत सारा उत्साह और उनकी श्रद्धा से भरी भक्ति देखने को मिलती है. कावड़ियों की इस भीड़ में रंग-बिरंगी कावड़े देखी जाती है.

परशुराम ने की थी पुरामहादेव में मंदिर की स्थापना (image source : patrika)

इस तरह शुरू हुई थी कावड़ यात्रा

कावड़ यात्रा की शुरुआत होने की कई कथाएँ बताई गयी है जिनमें से कुछ इस प्रकार है –

ऐसा कहा जाता है कि इस कावड़ यात्रा को परशुराम द्वारा शुरू किया गया था. दरअसल, परशुराम शिव के बहुत बड़े भक्त थे उन्होंने उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के पास एक गांव में पुरामहादेव में मंदिर की स्थापना की और वो सावन के महीने में हर सोमवार को कावड़ में गंगाजल भर के शिव जी का जलाभिषेक कर उनकी पूजा अर्चना करते थे. उस समय से आजतक ये परंपरा चलती आ रही है.

बता दें कि कावड़ यात्रा सावन के ही महीने में की जाती है इसके पीछे की मान्यता ये है कि इस महीने में समुद्र मंथन के दौरान बहुत सारा विष निकला था,  पृथ्वी को इस विष से बचाने के लिए भगवान शिव ने इस विष का अपने कंठ में धारण कर लिया, जिसके लिए वो नीलकंठ भी कहलाए गए. उस विष का भगवान शिव के शरीर पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ा. जिसके बाद उन्होंने अपने मस्तक पर चंद्रमा धारण कर लिया था. साथ ही सभी देवी देवताओं ने उन पर गंगाजल से अभिषेक किया. इससे उनके शरीर पर ठंडक पहुंची और उन्हें विष से राहत मिल पाई. तभी से ये परंपरा चलती आ रही है.

धरती को बचाने के लिए शिव जी ने पिया था समुद्र मंथन का विष (image source : welcomenri)

कांवड़ का महत्व

यह बात तो सभी जानते हैं कि पहले के समय में भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए लोग उनकी सच्चे मन और श्रद्धा से पूजा और तपस्या करते थे. भगवान शिव अपने भक्तों में इसी श्रद्धा को देख कृपा बरसाते हैं. शिव को प्रसन्न करने के लिये फाल्गुन और सावन के महीने में कांवड़ लाने की बहुत मान्यता है. हर साल करोड़ों की तादाद में शिवभक्त कांवड़ लेकर आते हैं. कहा जाता है कि ऐसा करने से सभी शिवभक्तों के बिगड़े और रुके हुए काम पूरे हो जाते हैं. बता दें कि इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण तत्व गंगाजल होता है क्योंकि उसी गंगाजल से भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है.

कई प्रकार की होती हैं ये कावड़ यात्रा

दरअसल, कावड़ के शुरूआती समय में इसे पैदल चलकर पूरा किया जाता था. पर बदलते समय के साथ इसके कई नियम और कायदे बन चुके हैं. तीन प्रकार की होती है कावड़ यात्रा –

खड़ी कावड़ (image source : newstracklive)

खड़ी कांवड़

खड़ी कांवड़ यात्रा को बेहद कठिन माना जाता है क्योंकि इसमें शिवभक्त अपने कंधे पर कांवड़ को लेकर पैदल यात्रा करते हुए गंगाजल लेने जाते हैं. इस कावड़ यात्रा के नियम बेहद कठिन होते हैं. दरअसल, इस यात्रा के दौरान ना तो कांवड़ को नीचे रखा जा सकता है और ना ही किसी जगह पर टांगा जा सकता है. अगर यात्रा के दौरान कोई कावड़ भोजन भी करता है या आराम करने के लिए रुकता है तो उसे अपने कावड़ को या तो स्टैंड में रखना होगा या फिर किसी अन्य कांवडिये को पकड़ा देना होगा लेकिन वो उसे जमीन पर नहीं रख सकता और ना ही उसे किसी पेड़ की टहनी पर टांग सकता है.

झांकी वाली कावड़ यात्रा (image source: livehindustan)

झांकी वाली कांवड़

इसमें शिवभक्त झांकी लगाकर कांवड़ यात्रा करते हैं. इसमें शिव मूर्ति को किसी ट्रक, जीप या किसी भी खुली गाड़़ी में भजन चलाकर कावड़ निकाली जाती है और लोग भजन पर झूमते हुए यात्रा करते हैं. इस तरह की कांवड़ यात्रा को झांकी वाली कांवड़ यात्रा कहा जाता है. इस दौरान भगवान शिव की मूर्ति को सजाया जाता है और उसका श्रृंगार करा जाता है.

डाक कावड़ (image source : ytimg)

अनोखी ही नहीं मुश्किल भी होती है डाक कांवड़

दरअसल, डाक कांवड़ झांकी वाली कांवड़ जैसी ही होती है. इसमें भी एक खुली गाड़ी में भगवान शिव की मूर्ति को सजाकर रखते हैं और भक्त शिव भजनों पर झूमते हुए जाते हैं. लेकिन इसका सबसे कठिन समय तब होता है जब मंदिर से दूरी महज 36 या 24 घंटे की रह जाती है तब सभी कावड़ियों को अपने कांवड़ में जल लेकर दौड़ना पड़ता हैं. पानी से भरे कावड़ को लेकर दौड़ना काफी काफी मुश्किल होता है. जब कोई इस तरह की कांवड़ यात्रा करता है तो उसे पहले संकल्प करना पड़ता है.