शनिदेव की पौराणिक कथा

धर्मचक्र में आपका स्वागत है आज हम आपको भगवान शनि की एक पौराणिक कथा के बारे में बतायेंगे. जिसमें आपको ये बताया जाएगा कि आखिर क्यों शनिदेव अपने पिता से क्रोधित रहते थे और कैसे उन्हें नौ ग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ और साथ ही उनके सबसे प्रसिद्ध मंदिर शनि शिंगणापुर के बारे में बताएँगे.

बात करें शनिदेव के जन्म की तो स्कंदपुराण के काशीखंड में कुछ इस प्रकार बताया गया है. विश्वकर्मा की बेटी  संज्ञा का विवाह सूर्यदेवता के साथ हुआ था. दरअसल, सूर्यदेव के तेज़ अधिक होने के कारण संज्ञा बेहद परेशान रहती थी तो वह सोचती रहती थी कि सूर्यदेव के तप को कम करने के लिए क्या किया जाए. फिर ऐसे ही समय बीतता गया और संज्ञा ने तीन संतानों को जन्म दिया जिनका नाम वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना था. तब तक भी संज्ञा सूर्यदेव के तेज़ से घबराती थी. उसके बाद संज्ञा ने ये फैसला लिया कि अब वो तप करके सूर्यदेव के इस तेज़ को कम करेंगी.

सूर्यदेव की तेज को कम करने के लिए उनकी पत्नी संज्ञा ने निकाली है तरकीब (image source:newshunt)

सूर्यदेव के तेज को कम करने के लिए उनकी पत्नी संज्ञा ने निकाली ये तरकीब 

अपने बच्चों के पालन-पोषण और सूर्यदेव को इस बात का पता ना चल पाए इसलिए संज्ञा ने एक तरकीब बनाई और अपने तप से उन्होंने अपनी हमशक्ल को पैदा किया जिसका नाम उन्होंने संवर्णा रखा. संज्ञा ने सूर्यदेव और अपने बच्चों की जिम्मेदारी अपनी छाया स्वर्णा को दे दी और उसे जिम्मेदारी देते हुए कहा कि अब से तुम मेरी जगह मेरे बच्चों और पति सूर्यदेव का ख्याल रखते हुए नारीधर्म का पालन करोगी. पर ध्यान रहे कि ये बात सिर्फ तुम्हारे और मेरे बीच ही रहनी चाहिए. इसके बाद संज्ञा अपने पिता के घर लौट गयी और अपने पिता को सारी परेशानियों के बारे में बताया.

सारी बात जानने के बाद संज्ञा के पिता विश्वकर्मा ने उन्हें डांट लगाकर वापिस भेज दिया. लेकिन संज्ञा घर ना जाकर एक वन में चली गयीं और एक घोड़ी का रूप धारण कर अपनी तपस्या में लीन हो गयीं. दूसरी तरफ सूर्यदेव को बिलकुल भी आभास नहीं हुआ कि उनके साथ रह रही स्त्री उनकी पत्नी संज्ञा नहीं बल्कि संवर्णा है. संवर्णा ने अपने धर्म को निभाया और छाया होने के कारण उसे सूर्यदेव के तप से भी कोई परेशानी नहीं हुई.

शनिदेव के जन्म पर उनके पिता ने उनके रंग की वजह से उन्हें नकारा (image source : navodayatimes)

जब सूर्यदेव और संवर्णा का मिलन हुआ तो उन्होंने शनिदेव को जन्म लिया. शनिदेव के जन्म के बाद जब उनके पिता ने उनका काला रंग देखा तो उन्होंने अपनी पत्नी छाया पर आरोप लगाते हुआ कहा कि शनि मेरा पुत्र नहीं है. उस समय से ही शनि और सूर्यदेव में शत्रुता शुरू हुई. अपने पिता सूर्यदेव से शत्रुता निभाने के लिए शनिदेव ने कई वर्षों तक भूखे-प्यासे रहकर शिव की आराधना की और साथ ही उनकी कड़ी तपस्या से अपने शरीर को दग्ध कर लिया. शनिदेव की इस भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने शनिदेव से वरदान मांगने को कहा.

शिव जी के इस वरदान से शनिदेव को मिला नौ ग्रहों में सबसे सर्वश्रेष्ठ स्थान

वरदान के रूप में शनिदेव ने शिवजी से प्रार्थना करते हुए कहा है प्रभु – युगों-युगों से मेरी मां छाया की पराजय होती आई है, उन्हें मेरे पिता सूर्य द्वारा बहुत अपमानित और प्रताड़ित किया गया है इसलिए मेरी माता की यही इच्छा है कि मैं (शनिदेव) अपने पिता से भी ज्यादा शक्तिशाली और पूज्य बनू. शनिदेव की बाते सुन शिवजी ने उन्हें वरदान के रूप में पूरे नवग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया. उन्होंने शनिदेव को पृथ्वीलोक के न्यायाधीश व दंडाधिकारी होने का वरदान दिया. इतना ही शिव जी ने वरदान देते हुए ये भी कहा कि सिर्फ साधारण मानव ही नहीं बल्कि देवता, असुर, सिद्ध, विद्याधर और नाग भी उनक नाम से भयभीत रहेंगे. जैसा कि आप सभी जानते हैं शनिदेव के प्रकोप से आज भी लोग बेहद भयभीत रहते हैं. अगर शनिदेव किसी की राशि में प्रवेश कर लें तो उसके जीवन में कष्ट शुरू हो जाते हैं.

शनिदेव को मिला नवग्रह में सर्वश्रेष्ठ स्थान (image source: navodayatimes)

शनिदेव का सबसे चमत्कारी मंदिर

वैसे तो शनिदेव के दुनियाभर में बहुत से मंदिर है लेकिन उनमें से एक प्रमुख मंदिर है जिसे शनि शिंगणापुर के नाम से जाना जाता है. आज हम आपको बताएँगे कि आखिर ये मंदिर क्यों इतना प्रमुख है और इसकी स्थापना कैसे हुई? दरअसल, ये मंदिर महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव शिंगणापुर में स्थित है. ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर में स्वयं शनिदेव महाराज वास करते हैं. यहाँ तक की इस गाँव के किसी भी घर में आपको दरवाज़े नहीं दिखेंगे क्योंकि ऐसी मान्यता है कि स्वयं शनिदेव इस गाँव के लोगों की रक्षा करते हैं. बता दें शिंगणापुर के इस चमत्कारी मंदिर में कोई पुजारी नहीं है.

इस गाँव के किसी भी घर में नहीं है दरवाज़ा (image source : patrika)

भक्त स्वयं इस मंदिर में प्रवेश करते हैं और शनिदेव के दर्शन करके मंदिर से बाहर निकल जाते हैं. इस मंदिर में शनिदेव का सरसों के तेल से अभिषेक किया जाता है. इस जगह पर ऐसी मान्यता है कि जब भी कोई भक्त मंदिर में प्रवेश करे तो सामने की तरफ देखता हुआ जाए और अगर इस दौरान उसे पीछे से कोई आवाज़ लगाए तो उसे मुड़ के नहीं देखना. उसके बाद शनिदेव को माथा टेक सीधा बाहर निकल जाना है. इस मंदिर में शनिदेव की कोई मूर्ति नहीं बल्कि एक बड़ा सा काला पत्थर है जिसको शनिदेव का ही विग्रह  माना जाता है. ऐसा माना गया है कि जो लोग शनिदेव के इस मंदिर में उनको तेल चढ़ाते हैं, उन्हें शनिदेव कभी कोई कष्ट नहीं देते.

ऐसे हुई थी शनि शिंगणापुर मंदिर की स्थापना (image source : cloudfront)

कैसे हुई इस मंदिर की स्थापना

दरअसल, सदियों पहले शिंगणापुर में काफी ज्यादा बारिश हुई थी, वर्षा की वजह से इस जगह पर बाढ़ की नौबत आ गयी थी. लोगों को ये बारिश प्रलय के समान लगने लगी. इस दौरान शनिदेव गाँव के एक शख्स के सपने में आए और उन्होंने उस व्यक्ति से कहा कि ‘मैं पानस नाले में एक विग्रह के रूप में मौजूद हूँ. मेरे उस विग्रह को  गाँव में लेकर आओ और इसे एक खुली जगह में स्थापित कर दो. सभी लोग इस नाले पर गए और वहां मौजूद शनि के विग्रह को देखकर हैरान रह गए. सभी गाँव वालों ने उस विग्रह को उठाने कि कोशिश की लेकिन वो विग्रह हिला भी नहीं सभी लोग हारकर वापिस लौट आए.

उसके बाद शनि महाराज दुबारा उसी व्यक्ति के सपने में आए और उन्होंने उनसे कहा कि यदि कोई मामा-भांजा मुझे उठाने आए तो मैं उस स्थान से उठ जाऊंगा और मुझे उसी बैल गाडी में बिठाना जिसमें बैल भी मामा—भांजा ही हो. फिर उनके कहे अनुसार एक मामा भांजे ने उस विग्रह को उठाया और बैलगाड़ी में उसे लाकर गाँव में लाया गया और उसी जगह उसे स्थापित किया जहाँ वो विग्रह वर्तमान जगह पर मौजूद है. उस विग्रह की स्थापना करने के बाद गाँव में बाढ़ की घटना टल गयी और पूरे गाँव में समृधि और खुशाली बढ़ने लगी इसलिए ये मंदिर शनिदेव का सबसे प्रमुख और चमत्कारी मंदिर कहलाता है.