तो जाने आखिर कैसे हुई इन 12 ज्योतिर्लिंगों की स्थापना?

धर्म चक्र में आपका स्वागत हैं और आज हम बात करने जा रहे हैं उन 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में. जिनके दर्शन मात्र से ही हमारा जन्म सार्थक हो जाता है और हमारी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है. चलिए जानते उन सभी 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में और और उनकी प्रसिद्ध पौराणिक कथाओं के बारे में –

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग (image source : google.com)

श्री सोमनाथ

बता दें कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं बल्कि पूरी पृथ्वी का सबसे पहला ज्योतिर्लिंग माना गया है. सोमनाथ मंदिर गुजरात के सोराष्ट्र में स्थित है. दरअसल, शिवपुराण में ये बताया गया है कि दक्ष प्रजापति ने जब चन्द्रमा को क्षय रोग का श्राप दिया था तो उन्होंने फिर इसी स्थान पर आकर तप किया और फिर इस श्राप से उन्हें मुक्ति मिली. कहा तो ये भी जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना खुद चंद्रदेव ने की थी. कम से कम 17 बार विदेशी आक्रमणों की वजह से ये शिवलिंग नष्ट हुआ. पर उसके बावजूद भी ये बार-बार बनता और बिगड़ता रहा.

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (image source : shrimathuraji)

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

अब हम बात कर रहे हैं मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की जो कि आंध्र प्रदेश की कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल के पर्वत पर स्थित है. दरअसल, एक समय की बात है जब श्री गणेश और श्री कार्तिकेय आपस में विवाह के लिए झगड़ने लगे. दोनों ही इस बात को लेकर झगड़ा कर रहे थे कि पहले किसका विवाह होगा. दोनों पुत्रों का झगड़ा देख माँ पार्वती और शिव जी ने कहा कि जो पहले पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाकर आएगा उसी का विवाह पहले होगा. माँ-पिता की इस बात को सुन कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन में बैठकर पृथ्वी का चक्कर लगाने चले गये.

गणेश जी के पास तो सवारी के तौर पर एक मूषक था तो उनके लिए इस दौड़ को जीतना नामुमकिन था. इस मामले में गणेश जी काफी बुद्धिमान थे उन्होंने कार्तिकेय के वापिस लौटने से पहले ही 2 कन्याओं से शादी कर ली. जिनसे उन्हें ‘क्षेम’ तथा ‘लाभ’ नाम के दो पुत्र भी हुए. जब कार्तिकेय वापिस लौटे तो ये सब देख काफी गुस्सा हो गये. फिर माता पार्वती के साथ भगवान शिव वहां ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए. तभी से वो मल्लिकार्जुन-ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग (image source : kaalsarppooja)

श्री महाकालेश्वर 

ये पवित्र महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर मध्यप्रदेश के उज्जैन नगर में स्थित है. दरअसल, प्राचीनकाल में उज्जयिनी में राजा चंद्रसेन का राज हुआ करता था और वो बहुत बड़े शिव-भक्त थे. एक दिन जब राजा चंद्रसेन शिव की भक्ति कर रहे थे तो उधर से एक पांच वर्ष का श्रीकर नाम का एक बालक अपनी मां के साथ गुज़र रहा था. जब उसने उस राजा का शिवपूजन देखा तो वो काफी अचंभित हुआ और उसके मन में जिज्ञासा होने लगी. उसके मन हुआ कि वो तुरंत उस प्रकार की सामग्री ले और शिवपूजन करने लगे. जब बालक शिवपूजन की सामग्री नहीं जुटा पाया तो उसने रास्ते से लौटते समय एक पत्थर का टुकड़ा लिया और फिर उस पत्थर को घर लाकर उसने उसे शिव का रूप देकर स्थापित कर दिया.

उसके बाद वो उस पत्थर की पुष्प, चंदन आदि लेकर उसकी पूरी श्रद्धा से पूजा करने लगा. जब माता ने बालक को भोजन के लिए बुलाया तो वो पूजा छोड़कर उठने के लिए तैयार नहीं हुआ. ये सब देख माता ने उस पत्थर के टुकड़े को गुस्से में उठाकर कहीं दूर जाकर फेंक दिया. बालक ये सब देख काफी दुखी हुआ और भगवान शिव को पुकारने लगा. रोते-रोते आखिर में बच्चा बेहोश होकर गिर गया.ऐसी भक्ति और प्रतिभा देख भगवान शिव बेहद प्रसन्न हुए. जब बालक को होश आया तो उसने देखा कि उसके सामने एक बहुत ही सुन्दर और बहुत ही विशाल सोने और हीरों से बना हुआ एक मंदिर खड़ा है. इतना ही नहीं मंदिर के अन्दर बहुत ही प्रकाश पूर्ण, चमकदार, तेजस्वी ज्योतिर्लिंग खड़ा है. जिसे देख बच्चा काफी प्रसन्न हो जाता है और खुश होकर शिव जी की स्तुति करने लगता है.

श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग (image source : ujjawalprabhat)

श्री ओंकारेश्वर-श्री ममलेश्वर

यह ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में स्तिथ है, जिस जगह पर ये ज्योतिर्लिंग है वहां नर्मदा नदी बहती है. इस पहाड़ के चारों और नदी बहने के कारण एक ॐ का आकार बनता है. इस ज्योतिर्लिंग का आकर ॐ का है इसलिए इसे ओंकारेश्वर नाम दिया गया है. बता दें कि इस लिंग के दो स्वरुप थे. एक बार विन्ध्यपर्वत ने पार्थिव-अर्चना से भगवान शिव की छः महीने तक कठिन अराधना की. उनकी इस अराधना से प्रसन्न होकर भूतभावन शंकरजी उस स्थान पर प्रकट हो गए. उन्होंने विन्ध्य को उनके मन अनुसार वर प्रदान किया. इस वर-प्राप्ति के मौके पर वहां बहुत से ऋषिगण और मुनि भी पधारे. उनकी ही प्रार्थना पर शिव जी ने अपने ओंकारेश्वर लिंग को दो भाग में बदल दिया. जिनमें से एक का नाम ओंकारेश्वर और दूसरे का ममलेश्वर पड़ा. दोनों लिंगो के स्थान अलग थे पर उसके बावजूद इन्हें एक ही स्वरुप माना गया.

श्री केदारनाथ (image source : punjabkesari)

श्री केदारनाथ

ये ज्योतिर्लिंग मंदिर देवभूमि उत्तराखंड के केदार नाम की चोटी पर स्थित है.  इसकी स्थापना कुछ इस प्रकार हुई. इस शोभाशाली हिमालय की चोटी पर महातपस्वी श्रीनर और नारायण ने कई वर्षों तक भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या कर बिना भोजन एक ही पैर पर खड़े होकर शिव नाम का जप किया. भगवान शिव उनकी इस कठिन साधना को देख प्रसन्न हुए और स्वयं उनके सामने प्रकट हुए और दोनों ऋषियों को दर्शन दिए. शिव जी को सामने देख दोनों बेहद प्रसन्न हुए. फिर भगवान शिव से वरदान मांगते हुए दोनों ने ‘भक्तों के कल्याण के लिए सदा के लिए उनके स्वरूप को उस जगह पर स्थापित करने को कहा.’ उनकी इस प्रार्थना पर शिव ने अपने ज्योतिर्लिंग रूप में वहां वास करना स्वीकार कर लिया. केदार नाम के हिमालय पर स्थित होने की वजह से इस ज्योतिर्लिंग का नाम श्री केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग पड़ा.

श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (image source : newshunt)

श्री भीमेश्वर

यह ज्योतिर्लिंग पुणे से 100 किलोमीटर की दूर सह्याद्री की पहाड़ी पर है. दरअसल, प्राचीनकाल में एक भीमा नाम का राक्षस था. वो राक्षस और कोई नहीं बल्कि कुंभकर्ण का पुत्र था. लेकिन उसने अपने पिता को कभी देखा नहीं था क्योंकि भगवान राम द्वारा पहले ही कुंभकर्ण का वध कर दिया गया. जब भीमा युवावस्था में आया तो उसकी माँ ने उसे सब कुछ बताया. विष्णु जी के अवतार श्रीरामचंद्र जी द्वारा अपने पिता के वध की बात सुन राक्षस बेहद क्रोधित हो उठा. अब वह हर समय भगवान श्री हरि के वध के उपाय सोचने लगा. अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए उसने हज़ार वर्ष तक कठिन तपस्या की. तपस्या से प्रसन्न ब्रह्माजी ने राक्षस को लोक विजयी का वरदान दे दिया. जिससे राक्षस सभी प्राणियों पर जुल्म से दंडित करने लगा. उसने सभी देवताओं को भी देवलोक से बाहर निकालकर अपना अधिकार जमा लिया.

उसके बाद राक्षस ने श्रीहरि को भी युद्ध में हरा दिया. फिर उसने शिवभक्त राजा सुदक्षिण पर आक्रमण कर बंदी बना लिया. भीम के इन अत्याचारों से घबराकर ऋषि-मुनि और देवगण तुरंत शिव की शरण में चले गए और उन्हें अपने दुख के बारे में बताया. उनकी यह प्रार्थना सुन भगवान शिव ने कहा, ‘उसने मेरे प्रिय भक्त, सुदक्षिण को बंदी बनाया अब वो और जीवित नहीं रह सकता.’ उसके बाद शिव ने उस राक्षस को वहीं भस्म कर दिया. शिव की इस अद्भुत कृत्य को देख ऋषि-मुनि और देवगण ने प्रार्थना करते हुए शिव को सदा के लिए वहां निवास करने को कहा. उनका कहना था कि ये अपवित्र जगह आपके निवास करने से पवित्र हो जाएगी. इस प्रार्थना को स्वीकार कर शिव ज्योतिर्लिंग रूप में यहाँ सदा के लिए निवास करने लगे. उनका ये ज्योतिर्लिंग भीमेश्वर के नाम से जाना गया.

श्री विश्वनाथ (image source : hotelrahilpalace)

श्री विश्वनाथ

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग काशी नाम के स्थान पर स्थित है. दरअसल, पार्वती से विवाह के बाद शिव कैलाश में ही रहते थे. विवाह के बाद पिता के घर रहना पार्वती जी को अच्छा नहीं लगा. तो उन्होंने शिव से कहा कि ‘मैं आपके घर रहना चाहती हूँ. इस जगह पर रहना मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता. शादी के बाद हर लड़की अपने पति के घर जाती है परन्तु मुझे पिता के घर में रहना पड़ रहा है.’ शिव ने पार्वती की इस बात को मानते हुए उन्हें अपनी नगरी काशी ले गए. फिर वो विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में वहां स्थापित हुए. जिसे काशी विश्वनाथ के नाम से भी जाना जाता है.

श्री त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग (image source : staticflickr)

श्री त्र्यम्बकेश्वर

यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के नासिक से 30 किलोमीटर दूर पश्चिम में स्थित है. शिवपुराण में इस मंदिर की स्थापना की कथा कुछ इस प्रकार दी गयी है. दरअसल, महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या से तपोवन में रहने वाले ब्राह्मणों की पत्नियाँ किसी बात को लेकर नाराज हो गईं. तो उन्होंने अपने पतियों से उनका अपकार करने के लिए उकसाया. इसी वजह से सभी ब्राह्मण गणेश जी की मन से अराधना करने लगें. प्रसन्न होकर गणेश जी उनके सामने प्रकट हुए और उन्होंने वर में ऋषि गौतम को बाहर निकलवाने की मांग की. विवश होकर गणेश जी को भी उनकी बात माननी पड़ी और फिर उन्होंने एक दुर्बल गाय का रूप लेकर ऋषि गौतम के खेत में चले गए.

जब ऋषि ने उन्हें अपने खेत की घास खाते हुए देखा तो वो बड़ी नरमी से अपने हाथ में तृण लेकर उसे हांकने के लिए लपके. पर तृण के स्पर्श से ही वो गाय मर गयी. इस वजह से ऋषि गौतम पर गो हत्या का आरोप लगा और लोग उसकी निंदा करने लगे. जिसके चलते उसे आश्रम छोड़कर जाना पड़ा लेकिन ब्राह्मणों ने वहां भी उनका जीना मुश्किल कर दिया. फिर ऋषि ने उन ब्राह्मणों से प्रार्थना की और कहा आप लोग मेरे प्रायश्चित और उद्धार के लिए कोई उपाय बताएं. तब उन्होंने बताया कि ‘अपने पाप से मुक्ति पाने के लिए तुम्हे अपने पाप को हर वक़त सबको बताते हुए तीन बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करनी होगी. उसके बाद लौटकर यहां एक महीने तक व्रत करना पड़ेगा. इसके बाद ‘ब्रह्मगिरी’ की 101 परिक्रमा करके तुम्हारी शुद्धि होगी और फिर यहां गंगाजी को लाकर उनके जल से स्नान करके एक करोड़ पार्थिव शिवलिंगों से शिवजी की आराधना करो. इसके बाद पुनः गंगाजी में स्नान करके इस ब्रह्मगरी की 11 बार परिक्रमा करो. फिर सौ घड़ों के पवित्र जल से पार्थिव शिवलिंगों को स्नान कराने से तुम्हारा उद्धार होगा.

महर्षि गौतम ने इन सभी कार्यों को पूरा करते हुए शिव की आराधना करी. उनकी आराधना से प्रसन्न शिव उनके सामने प्रकट हुए तो उन्होंने वरदान मांगते हुए शिव जी से कहा कि ‘भगवान्‌ मैं यही चाहता हूँ कि आप मुझे गो-हत्या के पाप से मुक्त कर दें.’ भगवान्‌ शिव ने कहा ‘गौतम ! तुम सर्वथा निष्पाप हो. गो-हत्या का अपराध तुम पर छलपूर्वक लगाया गया था. छलपूर्वक ऐसा करवाने वाले तुम्हारे आश्रम के ब्राह्मणों को मैं दण्ड देना चाहता हूँ.’ फिर ऋषि गौतम ने उनसे कहा कि ‘प्रभु! उन्हीं की वजह से मुझे आपके दर्शन मिले. अब उन्हें मेरा परहित समझकर उन पर आप क्रोध न करें.’ उसके बाद सभी ऋषि, मुनियों और देवगणों ने वहां एकत्र होकर गौतम की बात का समर्थन किया और भगवान शिव से सदा के लिए वहां निवास करने की प्रार्थना की. उसके बाद शिव उनकी बात मानकर वहां त्र्यम्ब ज्योतिर्लिंग के नाम से स्थित हो गए.

श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग (image source : .spiritbohemian)

श्री वैद्यनाथ

यह ज्योतिर्लिंग बिहार प्रांत के सन्थाल परगने में स्थित है. इस मंदिर की स्थापना के बारे में बताया गया है कि एक बार राक्षसराज रावण ने हिमालय पर जाकर भगवान शिव के दर्शन पाने के लिए कठिन तपस्या की. जिसके बाद उन्होंने अपने एक-एक सिर को काटकर पूरे नौ सिरों को शिवलिंग पर चढ़ाया. जब वो 10 वां सिर काटने जा रहे थे तो शिव जी प्रसन्न होकर उनके सामने प्रकट हुए. साथ ही उन्होंने उनके सभी सिरों को पहले की तरह जोड़ दिया और प्रसन्न होकर उनसे वर मांगने को कहा. रावण ने वर के रूप में भगवान शिव से उस शिवलिंग को अपनी राजधानी लंका में ले जाने की अनुमति मांगी. इस वरदान को पूरा करने के लिए शिव ने एक शर्त भी रखी.

उन्होंने कहा कि ‘तुम शिवलिंग ले तो जा सकते हो परन्तु अगर रास्ते में इसे कहीं रख दोगे तो यह वहीं टिक जाएगा, उसके बाद इसे नहीं उठा पाओगे.’ इस शर्त को मानते हुए रावण लंका की ओर चल पड़े. एक जगह उन्हें चलते-चलते लघुशंका लगी और फिर वो शिवलिंग को एक ही हाथ में पकड़ लघुशंका के लिए जा रहे थे. एक समय उन्हें शिवलिंग का भार इतना ज्यादा लगने लगा कि वो उसे संभाल ना सके और विवश होकर उन्हें शिवलिंग को भूमि पर ही रखना पड़ा.

उसके बाद जब वो लौटकर आए तो इतना प्रयत्न करने के बाद भी वो शिवलिंग को उठा ना सके. अंत में थककर उन्होंने उस पवित्र शिवलिंग पर अपने अँगूठे का निशान बनाकर उसे वहीं छोड़ दिया और लंका वापिस लौट गए. उसके बाद देवताओं ने उस शिवलिंग का पूजन किया. जिसे बाद में ज्योतिर्लिंग ‘श्रीवैद्यनाथ’ के नाम से जाना गया.

श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग (image source : southeast)

श्री नागेश्वर

भगवान् शिव का यह प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग गुजरात प्रांत में द्वारकापुरी से लगभग 17 मील की दूरी पर स्थित है. सुप्रिय नामक एक बड़ा धर्मात्मा और सदाचारी वैश्य था. वो शिव भगवान का बहुत बड़ा भक्त था. वह हमेशा उनकी आराधना, पूजन और ध्यान में मग्न रहता था. उसकी शिव भक्ति को देख दारुक नाम का एक राक्षस बहुत क्रोधित रहता था. एक बार सुप्रिय नौका पर सवार होकर कहीं जा रहा था. उस दुष्ट राक्षस ने इस अवसर का फायदा उठाया और नौका पर आक्रमण कर दिया और सभी यात्रियों को अपनी राजधानी में ले जाकर कैद कर लिया. कैद होने के बावजूद भी सुप्रिय अपने नियम के मुताबिक भगवान शिव की पूजा-आराधना करने लगा. उसने सभी बंदी यात्रियों को शिव भक्ति की प्रेरणा दी. इस बात का पता चलते ही दारुक कारगार आ पहुंचा. उस समय भी सुप्रिय शिव भक्ति में लीन होकर बैठा था.

ये सब देख दारुक ने क्रोध में आकर कहा ‘अरे दुष्ट वैश्य! तू आँखें बंद कर इस समय यहां कौन-से उपद्रव और षड्यंत्र करने की बातें सोच रहा है?’ उसकी राक्षस की किसी भी बात का उस पर कोई प्रभाव प्रभाव नहीं पड़ रहा था. क्रोध में आकर दारुक ने सभी बंदियों को मारने का आदेश दिया. सुप्रिय को पूरा भरोसा था कि उसकी आराधना से शिवजी इस विपत्ति से छुटकारा दिलाएँगे. प्रार्थना सुन भगवान शंकर जी तुरंत उस कारागार के एक ऊँचे स्थान में चमकते हुए सिंहासन पर स्थित होकर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए. सुप्रिय की कड़ी तपस्या से शिव ने उन्हें दर्शन देकर अपना पाशुपत-अस्त्र उन्हें प्रदान किया. इस अस्त्र से सुप्रिय ने राक्षस दारुक का वध किया और शिव के कहने पर ही इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर पड़ा.

श्री रामेश्वर ज्योतिर्लिंग (image source : blogspot)

श्री रामेश्वर

तमिल नाडू के रामनाथ पुरम में स्थित है. दरअसल, इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम जी ने की थी. कहा जाता है कि जब भगवान राम लंका पर चढ़ाई करने के लिए जा रहे थे तो उसी स्थान पर उन्होंने समुद्र की रेत से शिवलिंग बनाकर उसका पूजन किया. ऐसा भी कहा जाता है कि इस स्थान पर ठहरकर भगवान राम एक बार जल पी रहे थे कि आकाशवाणी हुई कि मेरी पूजा किए बिना ही जल पीते हो? इस वाणी को सुनकर भगवान श्रीराम ने रेत से शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की तथा भगवान शिव से रावण पर विजय प्राप्त करने का वरदान मांगा. उन्होंने प्रसन्न होकर ये वरदान भगवान श्रीराम को दे दिया. उसके बाद शिव ने लोक-कल्याणा के लिए सबकी प्रार्थना स्वीकारते हुए ज्योतिर्लिंग के रूप में वहां निवास किया. तभी से यह ज्योतिर्लिंग वहां विराजमान है.

श्री घुश्मेश्वर (image source: blogspot)

श्री घुश्मेश्वर

यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र में दौलताबाद से बारह मील दूर वेरुळ गाँव के पास स्थित है. पुराणों में ऐसा कहा गया है कि दक्षिण देश में देवगिरिपर्वत के निकट सुधर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था. उसकी पत्नी सुदेहा और उसमें बहुत ज्यादा प्रेम था. लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी . ज्योतिष-गणना से पता चला कि सुदेहा संतान को जन्म नहीं दे सकती. परन्तु सुदेहा संतान की बहुत ही इच्छुक थी. फिर उसने सुधर्मा से अपनी छोटी बहन से दूसरा विवाह करने का कहा. पत्नी की जिद के आकर उसने उसकी छोटी बहन घुश्मा से शादी कर ली. घुश्मा शिव की बहुत बड़ी भक्त थी वो प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाती थी और उनकी सच्चे मन और निष्ठा के साथ पूजन करती थी.

भगवान शिव की कृपा से थोड़े ही दिनों में उसने बेहद सुंदर और स्वस्थ बालक को जन्म दिया. पर ना जाने कैसे सुदेहा के मन में एक कुविचार आने शुरू हो गए. वो सोचने लगी की मेरा तो इस घर में कुछ भी नहीं है. सब कुछ घुश्मा का है. पति और बच्चे सब पर उसी का अधिकार है. तब तक घुश्मा का बेटा भी बड़ा हो गया और उसका विवाह हो चुका था. सुधर्मा के मन का कुविचार एक अंकुर से विशाल वृक्ष का रूप ले चुका था. एक दिन उसने घुश्मा के युवा पुत्र को रात में सोते समय मार डाला और उसके शव को उसी तालाब में फेंक दिया जिसमें घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंगों को फेंका करती थी. सुधर्मा और उसकी पुत्रवधू दोनों फूट-फूटकर रो रहे थे लेकिन घुश्मा हमेशा की तरह भगवान शिव की आराधना में मग्न रही. पूजा संपन्न होने के बाद घुश्मा पार्थिव शिवलिंगों को तालाब में छोड़ने के लिए चल पड़ी.

तालाब से लौटते समय उसे उसका बेटा वहां से निकलता हुआ दिखाई पड़ा. हमेशा की तरह वो घुश्मा के चरणों पर गिर पड़ा. उसी समय भगवान शिव भी वहां प्रकट हो गए और उन्होंने घुश्मा से वरदान मांगने को कहा. दरअसल, शिव जी सुदेहा की हरकत से बेहद क्रोधित हो गए थे और अपने त्रिशूल से उसका गला काटने को तैयार दिखाई दे रहे थे. फिर घुश्मा ने हाथ जोड़कर शिव से कहा ‘हे प्रभो! यदि आप मुझसे प्रसन्न हुए हैं तो मेरी उस अभागिन बहन को क्षमा करें. निश्चित ही उसने अत्यंत बुरा पाप किया है लेकिन आपकी दया से मुझे मेरा पुत्र अब वापस मिल गया है. अब आप उसे क्षमा करें और प्रभो! मेरी एक प्रार्थना और है कि आप लोक-कल्याण के लिए इस स्थान पर सदा के लिए निवास करें.’ भगवान शिव ने उसकी ये दोनों बातें स्वीकार की और ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर वह वहीं निवास करने लगे. सती शिवभक्त घुश्मा के आराध्य होने की वजह से ये घुश्मेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हुआ.